
जो आपके दिल के बहुत करीब हो, निश्छल और निष्कपट हो वो आपसे बात करते करते अदृश्य हो जाए तो दिल बैठता ही नहीं बल्कि टूट जाता है. अग्रज अनिल अग्निहोत्री के अचानक जाने की खबर से दिल टूट गया है.
अनिल जी यानि सबके प्रिय अन्ना से दो दिन पहले ही लंबी बात हुई थी. आईटीएम में चल रहे समारोह को लेकर. उनके साले सच्चिदानंद जोशी का जिक्र भी था. अनिल जी से इसी हफ्ते मिलने की बात हुई थी. लेकिन वादा अधूरा रह गया. अब वे कभी नही मिलेंगे. स्मृतियों में ही उनसे राम – राम होगी.
मेरे मित्रों में अनिल जी का स्थान सबसे अलग था. मुझसे आठ साल बडे होते हुए भी वे मुझे अचल भाई साहब कहते थे.शायद ये उनका तकिया कलाम था.उनके घर एक ही बार जाना हुआ, लेकिन हमारे रिश्ते पुराने थे. वे मेरे दिवंगत बहनोई शालिग्राम गोस्वामी के गांव गोहद के थे. खूब पढाकू, खूब लिक्खाड. सदा मुस्कराते रहने वाले अनिल जी मेरे पहले पाठक, पुस्तक के पहले खरीदार थे.अनिल जी से मेरा परिचय कोई दो दशक पुराना था लेकिन पिछले कुछ वर्षों से उनके स्नेह की छाया गहन हो गई थी.वे मराठी थे ये मैं बहुत बाद में जाना.
लंबी सरकारी सेवा से निवृत्ति के बाद उनका लेखन गति पकड रहा था. वे अमेरिका यात्राएं कर चुके थे. यात्रा वृत्तांत लिखना चाहते थे. पिछले दिनों उनका कविता संग्रह आया तो मुझसे समीक्षा लिखने को भी नहीं कहा, पुस्तक डाक से भेजकर मौन साध गए. मैने खुद फोन कर शिकायत की कि उन्होने लिखने में कंजूसी की. उन्हे गीत, और छंद मुक्त कविता का अलग संग्रह बनाने के लिए मना लिया था.अनिल जी की बैठक में लगा वंशवृक्ष मुझे आकर्षित लगा. शायद ही किसी घर में अपने परिवार का चार सदी पुराना दस्तावेज हो. वे इस वंशबेल पर गर्व अनुभव करते थे.
विनम्रता की प्रतिमूर्ति अनिल जी इस तरह अचानक विदा लेंगे कम से कम मैने तो नहीं सोचा था. उन्होने बताया था कि दिल हरकत कर रहा है किंतु ये किसने सोचा था कि दिल दगा ही दे जाएगा. अनिल जी मेरी हर पुस्तक के मुरीद थे. मेरे लेख संग्रह समय की सनद की भूमिका उन्होने बिना कहे तब लिख दी थी जब पुस्तक प्रकाशन की कोई योजना ही नहीं थी.उन्होंने मेरी हर पुस्तक नगद खरीदी.
मेरी दृष्टि में अनिल जी पुरुषार्थ में प्रथम रहे. परिवार, परंपरा, सरोकार, लेखन कुछ भी तो नहीं छूटा था उनसे. उनके लिए मैंउनके अनुज अजय और सुबोध से कम प्रिय नहीं रहा. सुबोध हमपेशा है. और अजय भी.उनका प्रेम, गुस्सा, मौन सब पारदर्शी रहा. छल-कपट से दूर रहने वाले अनिल जी पर ढेरों स्मृतियां थीं. मैं उनसे हमेशा स्मृतियों को लिपिबद्ध करने के लिए कहता था.मेरी नजर में वे प्रगतिशील विचारधारा के पोषक थे. चाहे मुकुट बिहारी सरोज स्मृति समारोह हो या देवेन्द्र आर्य की कविता उनके लिए सब प्रिय था.
वैचारिक रूप से संघ और भाजपा के लिए प्रतिबद्ध अनिल जी पिछले कुछ समय से पार्टी नेताओं के चाल, चरित्र से दुखी थे. वे संघ और भाजपा के बारे में लिखे लेख चटखारे लेकर पढते, फोन पर शाबासी देते और कहते कि उनकी अपनी सीमाएं हैं, जिन्हे वे तोड नहीं सकते.उन्होने अपने आंगन में कविता की बेल लगाई थी. उनके हाल के कविता संग्रह का नाम ही ‘ आंगन की बेल ‘ था. ये बेल और फैलती लेकिन प्रभु की लीला देखिए कि बेल अचानक सूख गई.
अनिल जी के लगभग पूरे परिवार से मुझे स्नेह मिला. वे अपने लेखक अनुज के भी उतने ही प्रशंसक थे जितने मेरे. धार्मिकता उनके जीवन को भीतर तक सींचती थी. अफसोस कि उनके अंतिम दर्शन नही कर पाया. लेकिन मेरे लिए अनिल जी सदैव उपस्थित हैं अपनी कविताओं में, ठहाकों में. अनिल जी के प्रति मैं तो वैसे भी श्रद्धानवत रहता ही था लेकिन आज औपचारिक रूप से इसे व्यक्त करते हुए मन भीगा हुआ है. सादर नमन